श्री भगवानदास आदर्श संस्कृत महाविद्यालय में हुआ संस्कृतकाव्यङ्गोष्ठी का आयोजन

हरिद्वार। श्री भगवानदास आदर्श संस्कृत महाविद्यालय में आज दिनाङ्क – 20/08/2026 को संस्कृतकाव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया। आयोजित संस्कृतकाव्यगोष्ठी एक अत्यन्त भव्य, प्रेरणादायक और अविस्मरणीय बौद्धिक समागम के रूप में संपन्न हुई। यह गोष्ठी न केवल संस्कृत साहित्य की महान काव्य परम्परा को अक्षुण्ण रखने का एक सशक्त प्रयास थी, अपितु आधुनिक परिप्रेक्ष्य में संस्कृत भाषा की जीवन्तता और उसकी रचनात्मक सार्थकता को नए आयाम देने वाली सिद्ध हुई। महाविद्यालय के प्राङ्गण में आयोजित इस ज्ञानयज्ञ में संस्कृत जगत् के अनेक मूर्धन्य विद्वानों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों का गरिमामय समागम देखने को मिला। इस भव्य आयोजन की अध्यक्षता महाविद्यालय की प्रबन्धसमिति के लब्धप्रतिष्ठ विद्वान् प्रो. यशवीर सिंह जी ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने संस्कृत भाषा की कालजयी प्रकृति, इसकी सहस्राब्दियों पुरानी धरोहर और आधुनिक युग में इसकी अपरिहार्यता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संस्कृतकाव्य परम्परा केवल प्राच्य ज्ञान-विज्ञान की धरोहर नहीं है, अपितु यह समकालीन संवेदनाओं, मानवीय मूल्यों और नवोन्मेषी विचारों को व्यक्त करने का एक अत्यन्त सशक्त माध्यम भी है।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में समुपस्थित उत्तराखण्ड संस्कृत संस्थान के सचिव प्रो. विनय विद्यालङ्कार ने अपने उद्बोधन से गोष्ठी की गरिमा को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया। उन्होंने संस्कृत काव्यशास्त्र की सूक्ष्मताओं, उसके रस, छन्द और अलङ्कार विधान के व्यावहारिक पक्ष पर अत्यन्त सहज और सुगम शैली में विचार व्यक्त किए।
काव्यगोष्ठी में मुख्यवक्ता के रूप में समुपस्थित संस्कृतहास्य एवं व्यङ्ग्य काव्य के बौद्धिक शिखर राष्ट्रपति पुरस्कार से समलङ्कृत डॉ. प्रशस्यमित्र शास्त्री जी ने अपनी व्यङ्ग्यात्मक एवं मधुर शैली का अद्भुत संयोजन प्रस्तुत किया। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समकालीन सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विसङ्गतियों पर अत्यन्त सटीक और हास्य-व्यङ्ग्य से परिपूर्ण प्रहार किए। उनकी छन्दोबद्ध पङ्क्तियों ने सभागार को करतल ध्वनि से गुञ्जायमान कर दिया। उनकी रचनाओं ने यह सिद्ध कर दिया कि संस्कृत काव्यपरम्परा अत्यन्त जीवन्त है और उसमें आधुनिक समसामयिक विषयों पर भी व्यङ्ग्य के बाण उतने ही पैने ढंग से चलाए जा सकते हैं, जितने कि किसी अन्य भाषा में।
उक्त काव्य गोष्ठी में महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य डॉ. भोला झा जी का पावन सान्निध्य प्राप्त होना अत्यंत गौरवपूर्ण रहा। आपने अपने सारगर्भित वक्तव्य में संस्कृत की समृद्ध ध्वनिकाव्य परंपरा पर गहराई से प्रकाश डाला। आपके ज्ञानवर्धक और विद्वतापूर्ण विचारों ने उपस्थित सभी श्रोताओं एवं विद्वानों को गहराई से लाभान्वित एवं प्रेरित किया।
कार्यक्रम के समापन सत्र में महाविद्यालय के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. रवीन्द्र कुमार जी ने सभी का धन्यवाद ज्ञापन किया। उन्होंने अपने ओजस्वी और सहृदय वक्तव्य से सङ्गोष्ठी में उपस्थित सभी अतिथि-विद्वानों, शोधार्थियों, महाविद्यालय परिवार के सभी सदस्यों के प्रति हृदय से आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि ऐसे उच्चस्तरीय साहित्यिक और बौद्धिक आयोजनों से न केवल महाविद्यालय का गौरव बढ़ता है, प्रत्युत संस्कृत काव्य-परम्परा को भी एक नया नवजीवन और सम्बल प्राप्त होता है।
इस आयोजन को सफलतापूर्वक सञ्चालित करने और इसकी सङ्कल्पना को धरातल पर उतारने में संयोजक मण्डल की भूमिका भी सराहनीय रही। डॉ. श्रीओम शर्मा, डॉ. अंकुर कुमार आर्य और डॉ. सुमन्त कुमार सिंह के कुशल संयोजन ने कार्यक्रम के प्रत्येक चरण को सुव्यवस्थित और रोचक बनाए रखा।
इस अवसर पर संस्कृत भारती के प्रान्त सङ्घटन मन्त्री श्री गौरव शास्त्री, प्रसिद्ध समाजसेवी श्री देशराज शर्मा, डॉ. हरिगोपाल शास्त्री, डॉ. पद्मप्रसाद सुवेदी, डॉ. अनिल त्रिपाठी, प्रो. रामप्रकाश वर्णी, डॉ. अतुल चमोला, डॉ. घनश्याम उनियाल, डॉ. दीनदयाल, डॉ. वेदव्रत, डॉ. सर्वेश तिवारी, डॉ. रामचन्द्र मेघवाल एवं महाविद्यालय के समस्त प्राध्यापकवृन्द, छात्र-छात्राएँ व महाविद्यालय के कर्मचारी उपस्थित रहें।

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